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Makhana Farming: बिहार के 5 जिलों में होती है मखाने की खेती, जानिए कैसे कीचड़ से निकलता है करोड़ों का सुपरफूड

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 पटना
 Makhana Farming in Bihar: किसी तालाब या दलदली पोखर के ऊपर तैरते कांटों से भरे बड़े-बड़े हरे पत्तों को देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि पानी की गहराइयों में एक अनमोल खजाना छिपा है।

यह कहानी है मिथिला के ‘सफेद मोती’ यानी मखाना की, जिसे आज पूरी दुनिया ‘सुपरफूड’ के रूप में पहचानती है।

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दुनियाभर में दबदबा
भारत दुनिया का 90 प्रतिशत मखाने का उत्पादन करता है और इसमें से 85 से 90 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा अकेले बिहार (खासकर दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया, कटिहार और सहरसा) में पैदा होता है।

बिहार के तालाबों के कीचड़ से निकलकर यह न्यूयॉर्क और लंदन के सुपरमार्केट्स में करोड़ों का 'सुपरफूड' बन चुका है।

यह सिर्फ एक सूखा मेवा नहीं, बल्कि मिथिला की संस्कृति, पूजा-हवन की परंपरा और लगभग 50,000 किसान परिवारों की आजीविका की रीढ़ है।

पानी में पलता है सुपरफूड (Makhana Farming)
मखाने का कुरकुरा और सफेद रूप किसी जादू से कम नहीं है, लेकिन इसके पीछे किसान की हाड़-तोड़ मेहनत और तपस्या छिपी होती है।

मखाने की खेती पारंपरिक रूप से तालाबों में या आधुनिक तरीके से उथले खेतों में की जाती है। बीज डालने के बाद पानी के भीतर से बड़े-बड़े कांटेदार गोल पत्ते सतह पर फैल जाते हैं।

इन्हीं में बैंगनी-गुलाबी रंग के सुंदर फूल खिलते हैं, जो बाद में कांटेदार फल बन जाते हैं। पूरी तरह पकने के बाद फल पानी के भीतर ही फट जाता है।

शुरुआत में बीजों के ऊपर लाल रंग का गूदा (अरिल) होता है, जिसके सहारे वे पानी पर तैरते हैं, लेकिन 2-3 दिन बाद गूदा गलते ही भारी काले बीज तालाब या खेत की तलहटी (कीचड़) में बैठ जाते हैं।

दलदल से दुनिया की थाली का सफर (Makhana Processing)
मखाने के औषधीय गुण और कुरकुरा रूप किसी जादू से कम नहीं है, लेकिन इसके पीछे किसान की कठिनमेहनत और तपस्या छिपी होती है।

तालाब की तलहटी से खोज: कांटेदार पौधों के नीचे से किसान पानी में डुबकी लगाकर काले बीजों (गुड़ी) को कीचड़ से बाहर निकालते हैं।

धूप में सुखाना और छंटाई: निकाले गए बीजों को धूप में सुखाया जाता है और आकार के अनुसार अलग-अलग छांटा जाता है।

आग की भट्टी में तपना: इसके बाद शुरू होती है सबसे कठिन परीक्षा। मिट्टी की हांडी या लोहे की कड़ाही में इन बीजों को 250 से 320 के खौलते तापमान पर भुना जाता है।

हथौड़े की थाप और लावा का जन्म: भूनते ही गरम-गरम बीजों को लकड़ी की थापी (हथौड़े) से बड़ी तेजी से फोड़ा जाता है। एक पल की भी देरी हो जाए तो मखाना खराब हो सकता है।

किसानों के हाथों पर पड़ने वाले गर्म छालों और पसीने की इसी भट्टी से फूटकर निकलता है सफेद, हल्का और फूला हुआ ‘मखाना लावा’। फिर इसकी पॉलिशिंग कर पैकिंग की जाती है और फिर देश-विदेश भेजा जाता है।

सेहत का खजाना
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग सेहतमंद खान-पान की तलाश कर रहे हैं, तो मखाना सबसे पसंदीदा स्नैक बनकर उभरा है।

वजन घटाने में मददगार: 100 ग्राम मखाने में फैट (वसा) की मात्रा न के बराबर (सिर्फ 0.1 ग्राम) होती है, जबकि इसमें 9.7 ग्राम प्रोटीन और प्रचुर मात्रा में फाइबर मिलता है।

ताकतवर अमीनो एसिड: इसका अमीनो एसिड इंडेक्स (89% से 93%) दूध, गेहूं और चावल से भी बेहतर माना गया है।

दिल और उम्र का रखवाला: इसमें मौजूद खास एंटीऑक्सीडेंट्स और फ्लेवोनोइड्स दिल को मजबूत रखने और बढ़ती उम्र के असर को धीमा करने (एंटी-एजिंग) में मदद करते हैं।

स्वादिष्ट रूप अनेक: चाहे व्रत की मखाना खीर हो, शाम की चाय के साथ देसी घी में भुना हुआ नमकीन मखाना, या फिर आज के दौर की मखाना कुकीज और फ्लेक्स हर स्वाद में लाजवाब लगता है।

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