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गोरखा भर्ती पर नेपाल में बवाल, पूर्व सैनिक बोले- अग्निवीर बनना खाड़ी में मजदूरी से बेहतर

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काठमांडू
भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ नेपाल के तीन दिन के दौरे पर हैं, लेकिन इस यात्रा के बीच भारत और नेपाल के सैन्य रिश्तों से जुड़ा एक पुराना विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। मामला है भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती का, जो 'अग्निपथ योजना' लागू होने के बाद से अटकी हुई है।

नेपाल के पूर्व गोरखा सैनिकों ने अब अपनी ही सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पोखरा में हुई पूर्व सैनिकों की एक रैली में तो पूर्व गोरखा जवानों का दर्द और गुस्सा साफ दिखाई दिया। उन्होंने काठमांडू की बालेंद्र 'बालेन' शाह सरकार से सीधा सवाल किया, "खाड़ी देशों में जाकर अनिश्चितता और कठिन परिस्थितियों में मजदूरी करने से तो कहीं बेहतर है कि हमारे युवा भारतीय सेना में अग्निवीर बनें।"

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दरअसल, काठमांडू की बालेन शाह सरकार के सामने इस वक्त बड़ा धर्मसंकट है। एक तरफ नेपाल के राजनीतिक तंत्र को लगता है कि अग्निपथ योजना के तहत मिलने वाली 4 साल की सेवा से गोरखा सैनिकों की पुरानी परंपरा को नुकसान पहुंचेगा। वहीं दूसरी तरफ, नेपाल के आम युवाओं और पूर्व सैनिकों के लिए यह सीधे तौर पर रोजगार का एक बड़ा जरिया है, जो पिछले कुछ सालों से बंद पड़ा है।

आखिर कहां फंसा है पेच?
भारतीय सेना और गोरखा जवानों का रिश्ता 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। 1814-16 के एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद अंग्रेजों ने गोरखाओं की बहादुरी से प्रभावित होकर उन्हें अपनी सेना में शामिल करना शुरू किया था। 1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसके तहत छह गोरखा रेजीमेंट भारतीय सेना का हिस्सा बनीं और बाद में एक और रेजीमेंट बनाई गई।

इस समझौते में सिर्फ भर्ती ही नहीं, बल्कि जवानों की तनख्वाह, पेंशन और बाकी सुविधाओं का भी पूरा ब्योरा था। पारंपरिक व्यवस्था में एक सैनिक इतने साल तक सेवा देता था कि वह पेंशन का हकदार बन जाता था।

लेकिन जून 2022 में जब भारत सरकार ने सेना में भर्ती के लिए 'अग्निपथ योजना' शुरू की, तो सब कुछ बदल गया। इस योजना के तहत 4 साल के लिए 'अग्निवीरों' को भर्ती किया जाता है, जिनमें से सिर्फ 25 फीसदी को ही आगे स्थाई सेवा में रखा जाता है। बाकी 75 फीसदी को 'सेवा निधि' पैकेज देकर कार्यमुक्त कर दिया जाता है।

नेपाल सरकार का तर्क है कि 1947 के समझौते की शर्तों में इतना बड़ा बदलाव बिना आपसी बातचीत और पुरानी परंपराओं को ध्यान में रखे बिना नहीं हो सकता। यही वजह है कि नेपाल ने नई व्यवस्था के तहत अपने नागरिकों को भर्ती होने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया।

पूर्व सैनिकों ने खोला मोर्चा
नेपाल में इस भर्ती के रुकने का सबसे बड़ा नुकसान वहां के युवाओं को हो रहा है। कोरोना और भर्ती बंद होने से पहले हर साल नेपाल से करीब 1,400 युवा भारतीय सेना में शामिल होते थे।

पोखरा में हुए हालिया प्रदर्शनों के दौरान पूर्व सैनिकों ने नेपाल सरकार को दो सूत्री ज्ञापन सौंपा है। उनका कहना है कि नेपाल के पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में भारतीय सेना की नौकरी केवल एक पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा जरिया रही है। अगर यह रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है, तो युवाओं के पास अरब देशों में जाकर मजदूरी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

भारतीय सेना पर कितना असर?
क्या इस रोक से भारतीय सेना की ऑपरेशन क्षमता पर फर्क पड़ा है? पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने जनवरी 2025 में साफ किया था कि नेपाल से नई भर्तियां न होने के बावजूद गोरखा बटालियनों की तैयारियों पर कोई असर नहीं पड़ा है। भारतीय सेना अपने मौजूदा संसाधनों के साथ पूरी मजबूती से काम कर रही है।

लेकिन जानकारों का मानना है कि मामला सिर्फ आज का नहीं है। अगर यह रोक कई सालों तक ऐसे ही खिंचती रही, तो भारतीय सेना की ऐतिहासिक गोरखा रेजीमेंटों का ताना-बाना और उनकी पारंपरिक पहचान प्रभावित हो सकती है।

बालेन शाह सरकार के सामने दोहरी चुनौती
प्रधान मंत्री बालेन शाह के लिए यह मुद्दा एक तरफ कूटनीतिक है, तो दूसरी तरफ घरेलू राजनीति से जुड़ा है। भारत का रुख साफ है- अग्निपथ योजना अब पूरी भारतीय सेना के लिए मानक प्रक्रिया है और इसमें किसी देश के लिए अलग नियम नहीं बनाए जा सकते।

वहीं नेपाल सरकार के सामने चिंता यह है कि 4 साल बाद सेना से वापस लौटने वाले सैन्य प्रशिक्षित युवाओं का समाज में पुनर्वसन कैसे होगा।

फिलहाल, पोखरा में पूर्व सैनिकों की हुंकार और जनरल धीरज सेठ की मौजूदगी ने इस मुद्दे को एक बार फिर दोनों देशों की प्राथमिकताओं में लाकर खड़ा कर दिया है। देखना यह होगा कि दोनों देश इस ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते को बचाए रखने के लिए क्या बीच का रास्ता निकालते हैं।

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