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कच्चे तेल पर बड़ी राहत, सऊदी अरब के फैसले से भारत को होगा फायदा; दिवाली तक बच सकते हैं हजारों करोड़

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नई दिल्ली

ग्‍लोबल एनर्जी मार्केट में सऊदी अरब के एक बड़े फैसले ने हलचल मचा दी है. दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल सऊदी अरब ने एशियाई ग्राहकों के लिए अपने प्रमुख अरब लाइट (Arab Light) कच्चे तेल की आधिकारिक बिक्री कीमत (Official Selling Price-OSP) में अगस्त की आपूर्ति के लिए प्रति बैरल 11 डॉलर की भारी कटौती की है. यह पिछले 26 वर्षों में एशिया के लिए की गई सबसे बड़ी मंथली कटौती मानी जा रही है. इतना ही नहीं साल 2020 के बाद पहली बार सऊदी अरब ने अपने इस प्रमुख ग्रेड को ओमान-दुबई बेंचमार्क के मुकाबले 1.50 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर उपलब्ध कराया है. एक्‍सपर्ट का मानना है कि यह फैसला केवल कीमत घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एशियाई बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है. खासकर ऐसे समय में जब रूस रियायती दरों पर तेल बेचकर भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बना चुका है. सऊदी अरब के इस ‘प्राइस वॉर’ से भारत के ऑयल इंपोर्ट बिल पर पॉजिटिव असर तय माना जा रहा है. भारत अपनी कुल जरूरतों का 85 फीसद तक आयात करता है. ‘मनीकंट्रोल’ रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-मई 2026 के दौरान भारत ने 35.5 अरब डॉलर (₹337970 करोड़) मूल्‍य का कच्‍चा तेल आयात किया था. सऊदी अरब की ओर से किए गए प्राइस कट और होर्मुज से जहाजों की आवाजाही सुचारू होने के बाद इंपोर्ट बिल में कमी आने की संभावना है. आगे चलकर कंज्‍यूमर को भी इसका फायदा मिलना तय माना जा रहा है। 

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दरअसल, कुछ सप्ताह पहले तक वैश्विक तेल बाजार में चिंता का माहौल था. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव तथा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में शिपिंग प्रभावित होने की आशंका के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया था. दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी स्‍ट्रेट से होकर गुजरता है. ऐसे में किसी भी तरह के खलल से ग्‍लोबल सप्‍लाई प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया था. हालांकि, अब हालात काफी हद तक सामान्य हो चुके हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही फिर से सुचारु हो गई है, खाड़ी देशों का निर्यात सामान्य स्तर पर लौट आया है और बाजार में तत्काल आपूर्ति संकट की आशंका काफी कम हो गई है. इसके साथ ही तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस (OPEC+) ने अगस्त से प्रतिदिन 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सहित अन्य उत्पादक देशों ने भी उत्पादन बढ़ाया है। 

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सऊदी का फैसला?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं तो भारत का इंपोर्ट बिल घट सकता है, चालू खाते का घाटा नियंत्रित रह सकता है और महंगाई पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. कम कीमतों का लाभ केवल सरकार तक सीमित नहीं रहेगा. विमानन, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, मैन्‍यूफैक्‍चरिंग और पेट्रोकेमिकल जैसे उद्योगों की लागत भी घट सकती है, क्योंकि ये सभी क्षेत्र पेट्रोलियम उत्पादों पर काफी हद तक निर्भर हैं. इससे उत्पादन लागत कम होने और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना रहती है. इसका सीधा फायदा आम उपभोक्‍ताओं को मिलने की संभावन है। 

क्या सस्ता होगा पेट्रोल और डीजल?
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत कम होने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल तुरंत सस्ते हो जाएंगे. भारत में खुदरा ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं. इनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनिंग मार्जिन, मालभाड़ा, डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले कर तथा सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णय शामिल हैं. इसलिए यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहता है और तेल कंपनियां इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं, तभी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना होगी। 

भारत और चीन पर फोकस
एशिया दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक क्षेत्र है. भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश सऊदी अरब के सबसे बड़े ग्राहक हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस बाजार में रूस की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते रूस ने रियायती कीमतों पर अपना तेल एशियाई देशों को बेचना शुरू किया. भारत और चीन रूस के सबसे बड़े खरीदार बनकर उभरे. ऐसे में सऊदी अरब पर दबाव बढ़ा. विश्लेषकों का मानना है कि कीमतों में इतनी बड़ी कटौती का उद्देश्य एशियाई रिफाइनरियों को आकर्षित करना और उन्हें रूस या अन्य सप्‍लायर्स की बजाय सऊदी तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना है. इसके अलावा चीन की धीमी आर्थिक वृद्धि के कारण वहां तेल की मांग में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है, जिससे भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। 

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